मेरी माँ

बीमार होता हूँ तो
रात भर जागती है।
हर शाम चौखट पे खड़े खड़े
मेरी राह ताकती है।

नजर कमजोर हो चली है…
सुई में धागा नहीं डाल पाती है।
हाँ मगर कौन सी चीज कहाँ रखी है…
बिना देखे ही वो मुझे बता देती है।

बिना सैलरी के ही वो…
घर के सारे काम संभालती है।
यहाँ तक कि नेशनल होली-डे पे भी
वो अवकाश नहीं माँगती है।

मेरी माँ है वो,
जो खुद तकलीफ में होती है तो भी…
मुझे खाना खिलाकर ही मानती है।

– विनोद © विशाल सिंह

बच्चों की मजबूरी और मजदूरी

सर्द मौसम में जब निकलता हूँ घर से बाहर,
दिख जाते हैं नन्हे-नन्हे हाथ काम करते हुए।
कहाँ गयी बचपन की बेफ़िकरी, वो चेहरे की मुस्कान?
इस तंग भरे माहौल में, आखिर क्यों,
दिख रहे हैं बच्चे काम करते हुए?

क्या महँगाई ने चुरा लिए सारे खिलौने?
क्या जल गई सारी किताबें भुखमरी की आग में?
क्या सचमुच पेट की अाग बचपन को भी खा गई?
चाहे जो भी हो वजह, सड़क के किनारे,
इस तंग भरे माहौल में, आखिर क्यों,
दिख रहे हैं भगवान के फ़रिश्ते , काम करते हुए?


अक्सर दिख जाते हैं वो नन्हे हाथ इमारतों में,
शरारतें करते नहीं, काम करते हुए।
न जाने क्यों सवार हुई गरीबी माँ-बाप के सर पे,
और मजबूर कर गई बाल मजदूरी के लिए?
इस तंग भरे माहौल में, आखिर क्यों,
दिख रहे हैं देश के भविष्य, काम करते हुए?

~विनोद © vishal singh

करते हो प्यार मुझे, पर कहते क्यों नहीं पापा।

अब बड़ा मैं हो गया हूँ,
स्वभाविक है कि समझदार बनूँ।
पर सत्य यह भी तो है
कि अापके लिए तो बच्चा ही हूँ,
अपने इस बच्चे के माथे को
चूमते क्यों नहीं पापा?
करते हो प्यार मुझे,
पर कहते क्यों नहीं पापा?

प्रतिस्पर्धा के इस दौर में
जब कुछ अच्छा कर जाता हूँ,
हर्षित को कर जब घर को आता हूँ,
मेरा अभिवादन लेने के बाद
मुझे गले लगाते क्यों नहीं पापा?
करते हो प्यार मुझे,
पर कहते क्यों नहीं पापा?
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है घर कौनसा इस जग में,
जहाँ ना विपदा आती हो।
हर संकट हर विपदा को,
आप स्वयं ही झेलते जाते हो।
चलता है क्या द्वंद अंतर्मन में,
ये राज खोलते क्यों नहीं पापा?
करते हो प्यार मुझे,
पर कहते क्यों नहीं पापा?

जब दूर मैं घर से होता हूँ,
हो चूर जवानी के मद में
गलतियाँ अनकों कर देता हूँ।
तब खयाल आपका आता है,
मैं बैठ एकांत में फूटकर रो देता हूँ।
अपराध-बोध के मेघों में घिरता देख,
मुझे राह दिखाते क्यों नहीं पापा?
करते हो प्यार मुझे,
पर कहते क्यों नहीं पापा?
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कुछ साल पहले ही तो,
पुरानी साइकल पे बिठाकर
मुझे बाजार ले जाते थे।
बहुत जिद करता था तो
चंद खिलौने भी दिलवा देते थे।
अब जो कुछ मांगता हूँ,
रुपए माँ से दिला देते हो।
बचपन की भाँति मेरे संग-संग
बाजार क्यों नहीं चलते पापा?
करते हो प्यार मुझे,
पर कहते क्यों नहीं पापा?
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#Papa #love #teenage #feelings